थाली बेच दी लेकिन किताब नहीं छोड़ी ✨📚

थाली बेच दी लेकिन किताब नहीं छोड़ी ✨📚


📚✨ कहानी: थाली बेच दी लेकिन किताब नहीं छोड़ी ✨📚
बिहार के एक छोटे से गाँव में राजू नाम का लड़का रहता था। मिट्टी से लिपा-पुता घर, खपरैल की छत, आँगन में बैठी बकरियाँ — यही उसकी दुनिया थी। पिता मज़दूरी करते थे और माँ दूसरों के खेतों में काम करके घर चलाती थी।

राजू की उम्र आठ साल थी, लेकिन उसके सपने इतने बड़े थे कि गाँव की कच्ची गलियाँ भी उन सपनों को रोक न सकीं। सुबह चार बजे उठकर पहले माँ के साथ चूल्हा जलाता, फिर बकरियों को चारा डालता, तब कहीं जाकर स्कूल जाता।

स्कूल भी कैसा — मिट्टी का फर्श, टपकती छत, टूटी कुर्सियाँ — लेकिन राजू के लिए वो इमारत किसी महल से कम नहीं थी। उसने वहीं पहली बार ‘पढ़ना-लिखना’ सीखा। वो हर दिन बस्ते में अपनी किताबों को ऐसे संभालकर रखता जैसे कोई राजकुमार अपनी तलवार को संभालता है।


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🌾 कठिनाई का पहला सबक

एक दिन उसके पिता बीमार पड़ गए। घर का खर्चा ठप हो गया। माँ ने खेतों में मज़दूरी बढ़ा दी, लेकिन पैसे फिर भी कम पड़ रहे थे।
राजू की किताबों की फीस जमा नहीं हो पा रही थी। मास्टरजी ने साफ कहा — “अगर फीस नहीं दोगे तो नाम काट दूँगा।”

राजू भागा-भागा घर पहुँचा। माँ से बोला —
“माँ, मैं स्कूल नहीं छोड़ूँगा!”
माँ ने आंसू पोछे — “बेटा, अब पैसे कहाँ से आएँगे? घर में दो वक़्त की रोटी भी मुश्किल है।”


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🥣 थाली भी बिक गई

राजू चुपचाप उठा, घर के कोने में रखी एल्युमिनियम की पुरानी थाली ले आया। यही थाली थी जिसमें उसका परिवार रोज खाना खाता था। उसने माँ के हाथ में रख दी —
“माँ, इसे बेच दो। मैं रोटी हाथ पे रखकर खा लूँगा, लेकिन किताब हाथ से नहीं छूटेगी।”

माँ की आँखों से आँसू बह निकले। गाँव में किसी को यह बात पता चली तो सबने राजू को पागल कहा। पर राजू को दुनिया की परवाह नहीं थी — उसे तो बस किताब चाहिए थी।


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📖 तपस्या रंग लाई

थाली बिक गई, फीस भर गई। राजू पढ़ता रहा। खेतों में मज़दूरी भी करता, पास के गाँव में रात को दीये की रोशनी में पढ़ता। उसे किताबों से प्यार हो गया। उसने अपने गाँव के बच्चों को भी पढ़ाना शुरू किया — गाँव की छतों, पेड़ों के नीचे, स्कूल के बरामदों में। उसके दोस्त उसे ‘गुरुजी’ कहने लगे थे।


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✈️ कहानी ने उड़ान भरी

कई साल बीत गए। राजू ने गाँव का पहला लड़का बनकर इंटर पास किया। फिर शहर गया — वहीं होस्टल में झाड़ू लगाई, बर्तन धोए — पर किताब नहीं छोड़ी। मेहनत इतनी की कि उसने सरकारी परीक्षा में टॉप किया। उसी गाँव के लोग जो कभी उसका मज़ाक उड़ाते थे, अब उसे फूल-माला पहनाने लगे।

आज वही राजू गाँव के सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल है। उसके स्कूल के बाहर दीवार पर लिखा है —
“शिक्षा के लिए थाली भी बेचनी पड़े तो बेच दो, हाथ पे रोटी रख कर खा लो, लेकिन पढ़ो!”

राजू रोज बच्चों को यही कहानी सुनाता है। कहता है —
“भूख से मत डरना, गरीबी से मत डरना, दुनिया क्या कहेगी उससे मत डरना। अगर डरना ही है तो किताब छूटने से डरना।”


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📚✨ सीख:

गरीबी किताब से बड़ी नहीं होती। जब किसी के पास कुछ नहीं होता, तब उसके पास खुद पर भरोसा होता है। और यही भरोसा किसी को भी मिट्टी से उठा कर आसमान में बैठा देता है।


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