धान के खेत में उम्मीदों की फसल
उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गाँव — परवन सिंह पूर्वा।
नाम भले ही छोटा था, पर यहाँ की मिट्टी में बड़ा दम था। पीढ़ियों से इसी मिट्टी ने गाँव वालों के जीवन को थामा हुआ था। चारों तरफ हरे-भरे खेत, दूर तक फैली धान की बालियाँ, पंछियों की आवाज़ और गाँव के लोगों की हँसी — यही था परवन सिंह पूर्वा।
बरसात का मौसम था। धान की नर्सरी से पौधे उखाड़कर खेत में रोपाई करने का समय था। खेत में पानी भरा हुआ था — कहीं-कहीं कीचड़ घुटनों तक चढ़ जाता। सूरज सिर पर चढ़ा था लेकिन बादलों के बीच से निकलती-छिपती धूप ने मौसम को और उमस भरा बना दिया था।
रामदुलारी, ललिता, पनकी, जसोदा और बाकी गाँव की औरतें रोज की तरह खेत में उतर गईं। उनका सिर लाल रंग की पट्टियों से बँधा था, कपड़े की साड़ियाँ गीली हो चुकी थीं — लेकिन उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक अजीब सी सुकून भरी मुस्कान थी। क्योंकि इन्हीं खेतों से उनका घर चलता था, बच्चों की पढ़ाई, बेटियों की शादी, त्योहारों के पकवान — सब इसी मिट्टी की देन था।
लेकिन इस बार गाँव के लोग परेशान थे।
पिछले साल बाढ़ ने आधा गाँव डुबो दिया था। खेत उजड़ गए थे, अनाज गल गया था। ऊपर से महाजन का कर्ज़ — ब्याज इतना कि मूलधन कहीं खो गया। रामदुलारी ने पिछले साल बाढ़ में अपनी गाय खो दी थी — वही गाय जिसने उसके बच्चों को दूध दिया था, खेत में हल खिंचवाया था।
गाँव के किसान कई बार तहसील के चक्कर काट आए थे — अफसर ने हर बार कहा, “फाइल ऊपर भेज दी है।” नेता जी चुनाव में वादा कर गए थे, “सरकारी मदद आएगी।” लेकिन वो मदद कभी गाँव तक नहीं आई।
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एक दिन बदल गया सब कुछ
इन्हीं हालात में गाँव में खबर आई — “बाबू साहब आ रहे हैं, खुद खेत देखने।”
किसी ने कहा — “अरे वो शहर वाले अफसर हैं। जूते-मोज़े पहने आते हैं, चमचमाती गाड़ी से उतरते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं।”
रामदुलारी ने भी यही सोचा। लेकिन वो गलत थी।
अगली सुबह बाबू साहब आए। गाँव में पहले हलचल हुई — नेता जी, सरपंच, सब उनके साथ थे। लेकिन बाबू साहब ने सीधा खेत का रास्ता पकड़ा। रामदुलारी ने देखा — उन्होंने जूते-मोज़े उतार दिए, पैंट मोड़ दी, खुद ही खेत में उतर गए।
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कीचड़ में उतरता अफसर
बाबू साहब ने बिना कुछ बोले एक गड्डी में से पौधे निकाले। ललिता ने झिझकते हुए कहा —
“साहब, हाथ गंदे हो जाएँगे…”
साहब ने हँस कर कहा —
“बहन जी, जब किसान के हाथ गंदे होते हैं तभी हमारे घर में खाना बनता है। ये कीचड़ नहीं, ये तो सोना है।”
गाँव की औरतें पहले थोड़ी शर्माईं, फिर सबके चेहरों पर एक नई चमक आ गई। सबने एक साथ रोपाई शुरू की। बाबू साहब के सफेद कपड़े अब कीचड़ से सने थे — लेकिन उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि वही आत्मविश्वास था, जो एक सच्चे इंसान में होता है।
पीछे मंगलू काका अपनी बैलगााड़ी से हल चला रहा था। उसने यह नज़ारा देखा तो उसकी बूढ़ी आँखों में नमी आ गई — उसने अपनी पोती पनकी से कहा —
“देख री पनकी, जब बड़े लोग मिट्टी में उतरते हैं ना, तब समझो असली बारिश आने वाली है।”
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नई उम्मीद, नया विश्वास
काम खत्म होते-होते हल्की बारिश शुरू हो गई। बाबू साहब ने खेत से निकलते हुए सबको इकठ्ठा किया। बोले —
“काका, ये बाढ़ राहत का पैसा तुम्हारे गाँव तक पहुँचेगा — सीधे बैंक खाते में। अगले हफ्ते ट्रैक्टर भी आएगा — सरकार देगी। स्कूल के लिए नई बिल्डिंग बनेगी। और इस बार, तुम्हारे धान का सही दाम दिलवाना मेरी जिम्मेदारी है।”
गाँव के लोग अवाक थे — इतनी बड़ी-बड़ी बातें सबने पहले भी सुनी थीं, लेकिन इस बार कोई मिट्टी में उतर कर बोल रहा था, तो सबको यकीन भी था।
रामदुलारी ने हाथ जोड़कर कहा —
“साहब, तुमने तो हमें फिर से जीने की हिम्मत दी है। अब हम भी अपने बच्चों को बताएँगे — कि कोई देखे या ना देखे, भगवान सब देखता है — और किसी ना किसी को मदद के लिए भेज ही देता है।”
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अंत
बारिश तेज हो चुकी थी। खेत में पानी की बूँदें गिर रही थीं — पौधों के बीच नई जान फूट रही थी। गाँव वालों के दिल में भी। आज इस गांव में सिर्फ धान की फसल नहीं बोई गई — आज उम्मीद बोई गई थी, विश्वास बोया गया था, और आने वाले कल की एक नई सुबह भी।
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सीख:
जो हाथ मिट्टी से जुड़ते हैं, वही हाथ इंसानियत को फलते-फूलते हैं। खेत से निकली ये कहानी बताती है — असली नेता वो नहीं जो भाषण देता है, असली नेता वो है जो साथ खड़ा होता है — कीचड़ में उतर कर भी।
🌾✨ खेत की मिट्टी पर कुछ पंक्ति ✨🌾
धरती माँ की गोद में जब बीज उम्मीद बोते हैं,
किसान के हाथों में तब भगवान भी होते हैं।
पानी की बूँदें, पसीने से मिलकर गीत बनाती हैं,
कड़ी धूप में भी हरियाली की छाँव सजाती हैं।
जिसने कीचड़ में उतरकर किसानों का दुख समझा,
उसी ने भूखे पेट का सच, आँखों का सपना पढ़ा।
हल चलाते बैल भी अब मुस्कान बाँटते हैं,
धान की नन्हीं पौधें हर दिल को साथ बाँधते हैं।
जब खेत में संग-संग मजदूर और मालिक खड़ा हो,
समझो मिट्टी में नया सूरज फिर से बड़ा हो।
"जहाँ खेत हरा है, वहीं देश खरा है!" 🌱✨
जय जवान, जय किसान
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