ईमानदारी की फसल
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव सुनहरीपुर में एक किसान रहता था — नाम था रामलाल। रामलाल के पास ज़मीन ज़्यादा नहीं थी, बस तीन बीघा खेत और एक पुराना बैल, जिसका नाम था नंदू। लेकिन रामलाल के पास जो सबसे बड़ी पूँजी थी, वह थी उसकी ईमानदारी और मेहनत।
रामलाल हर सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता था। सबसे पहले वह अपने बैल को चारा डालता, फिर खेत में हल चलाता, बीज बोता और खेत की मेड़ों को सँवारता। बारिश कम हो या ज्यादा — रामलाल कभी हार नहीं मानता था। गाँव वाले उसे देखकर कहते,
"रामलाल, तेरी मेहनत देखकर भगवान भी तरस खा जाएंगे!"
लेकिन किस्मत हमेशा साथ नहीं देती। एक साल गाँव में सूखा पड़ गया। कुएँ सूख गए, नहर में पानी नहीं आया। खेत की मिट्टी प्यास से दरकने लगी। कई किसानों ने खेत गिरवी रख दिए, किसी ने शहर की ओर रुख कर लिया। पर रामलाल ने हार नहीं मानी।
उसने गाँव के पुराने तालाब की सफाई शुरू की — अकेले! लोग हँसते थे — "अरे रामलाल, तू अकेला क्या कर लेगा?" मगर रामलाल ने परवाह नहीं की। रोज़ थोड़ी-थोड़ी मिट्टी निकालता, तालाब की पाल को मजबूत करता। धीरे-धीरे कुछ नौजवान भी उससे जुड़ गए। महीने भर में तालाब साफ हो गया। बारिश हुई तो तालाब लबालब भर गया। उसी पानी से रामलाल ने अपनी फसल को सींचा — और दूसरों के खेतों को भी।
फसल अच्छी हुई तो गाँव के साहूकार ने रामलाल के पास आकर कहा —
"रामलाल, तेरी फसल अच्छी है, थोड़े पैसे उधार ले ले, बीज और खाद और ले आ, अगले साल और ज्यादा मुनाफा होगा!"
पर रामलाल ने साफ मना कर दिया — "मैं जितना कमाता हूँ, उतना ही लगाता हूँ। उधार लेकर लालच मत पालो, यही सही है।"
रामलाल का बेटा मनोज शहर में पढ़ता था। उसने पिता से कहा — "बाबा, आप क्यों इतना कष्ट करते हो? मैं अच्छी नौकरी पा लूँगा तो शहर बुला लूँगा, आप आराम करना!"
रामलाल मुस्कुरा कर बोला — "बेटा, खेत छोड़ दूँगा तो मेहनत छोड़ दूँगा। मेहनत छोड़ दूँगा तो खुद को छोड़ दूँगा। मैं खेत में हल चलाता हूँ, तभी तो तुम्हें पढ़ा पा रहा हूँ। यही मेरी इज्ज़त है।"
कुछ साल बाद मनोज की नौकरी लग गई। उसने पिता के खेत के लिए ट्रैक्टर खरीदने की जिद की। रामलाल ने कहा — "ठीक है बेटा, मगर पुराने नंदू को कहीं छोड़ना मत। वह भी परिवार का हिस्सा है।" ट्रैक्टर आया, पर रामलाल अब भी नंदू को दुलारता, खेत में कभी-कभी उसी से हल चलवाता। उसे लगता — मेहनत का असली स्वाद मिट्टी में ही है।
रामलाल ने अपने गाँव के बच्चों को भी खेत दिखाना शुरू किया। वह कहता —
"बेटा, खेत में हल चलाना छोटा काम नहीं है। यहीं से रोटी बनती है। जिस दिन किसान ईमानदार रहेगा, उस दिन देश भूखा नहीं सोएगा।"
धीरे-धीरे गाँव में बदलाव आया। गाँव के और किसान भी तालाब, नहर और सिंचाई पर ध्यान देने लगे। बच्चों ने पेड़ लगाने शुरू किए। रामलाल की तरह सबने अपनी मेहनत पर भरोसा करना सीखा।
रामलाल ने कभी रिश्वत नहीं दी, न किसी को धोखा दिया। उसके गेहूँ में कभी मिट्टी या कंकड़ नहीं मिलाए। मंडी में व्यापारी उसे दूर से देखकर कहते — "लो, ईमानदार रामलाल आ गया। इसकी बोरियों में बेईमानी नहीं मिलेगी!"
रामलाल की उम्र ढलने लगी, बाल सफेद हो गए, मगर उसका हौसला हरा बना रहा। एक दिन गाँव के स्कूल में उसे बुलाया गया — बच्चों को ईमानदारी पर भाषण देने। रामलाल ने बस एक ही बात कही —
"मेहनत के बीज बोओ, ईमानदारी से पानी दो — फसल चाहे कम हो, पर दिल हमेशा भरा रहेगा।"
आज भी सुनहरीपुर में जब कोई बच्चा खेत में हल चलता है, तो गाँव वाले कहते हैं — 'रामलाल के जैसे बनो, मेहनत और ईमानदारी की मिसाल!'