कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
उपरोक्त श्लोक में बताया गया है कि बिना फल की इच्छा के ही कर्म की प्रधानता सबसे बलशाली मानी गई है। अर्थात यदि व्यक्ति किसी कार्य में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो उसके लिए सबसे अनिवार्य है कि वह अपने कर्म पर सबसे अधिक ध्यान दें। गीता में कहा गया है कि जब व्यक्ति फल की इच्छा से कर्म करता है तो उसका ध्यान अपने कर्म पर कम और उसके फल पर ज्यादा रहता है जिसकी वजह से करता है उसे सफलता प्राप्त होती है इसलिए फल की चिंता न करें केवल निरंतर कर्म करें।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
उपरोक्त श्लोक में बताया गया है कि बिना फल की इच्छा के ही कर्म की प्रधानता सबसे बलशाली मानी गई है। अर्थात यदि व्यक्ति किसी कार्य में सफलता प्राप्त करना चाहता है तो उसके लिए सबसे अनिवार्य है कि वह अपने कर्म पर सबसे अधिक ध्यान दें। गीता में कहा गया है कि जब व्यक्ति फल की इच्छा से कर्म करता है तो उसका ध्यान अपने कर्म पर कम और उसके फल पर ज्यादा रहता है जिसकी वजह से करता है उसे सफलता प्राप्त होती है इसलिए फल की चिंता न करें केवल निरंतर कर्म करें।
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Geeta Gyan